उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बीजेपी की नई बिसात, ‘दलित वोट’ साधने की कोशिश
उत्तराखंड में संत रविदास के सहारे बीजेपी का ‘समरसता मिशन’, विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर नई रणनीति, सियासत हुई तेज, धीरज सजवाण की रिपोर्ट
देहरादून: उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने अपने सबसे अहम सामाजिक और राजनीतिक मिशन की शुरुआत करने का फैसला किया है. जिसके तहत बीजेपी ने उत्तराखंड में दलित वोट बैंक तक पहुंच बढ़ाने के लिए संत रविदास की 650वीं जयंती को केंद्र में रखकर ‘समरसता संकल्प अभियान’ शुरू करने की रणनीति बनाई है. पार्टी का लक्ष्य प्रदेश के करीब 17 फीसदी दलित वोट बैंक में अपनी पकड़ को और मजबूत करना है. इसके लिए अगले साल फरवरी में संत रविदास की 650वीं जयंती को केंद्र में रखते हुए पूरे देश के साथ उत्तराखंड में भी समरसता संकल्प अभियान चलाया जाएगा.
बीजेपी इस अभियान को सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक जागरण का कार्यक्रम बता रही है. जबकि, विपक्ष इसे दलित वोटों को साधने की चुनावी रणनीति करार दे रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह अभियान केवल धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव से पहले सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में करने की बड़ी राजनीतिक कवायद भी है.
लोहिया के गैर कांग्रेसवाद की उपज लालू-मुलायम जैसे बड़े नेता: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड की सामाजिक और राजनीतिक संरचना उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से काफी अलग है. यहां दलित समाज का अपना सामाजिक इतिहास, स्थानीय नेतृत्व और अलग राजनीतिक व्यवहार रहा है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रविंद्र नाथ कौशिक बताते हैं कि,
भारतीय राजनीति में जातीय समीकरण कोई नई बात नहीं: रविंद्र नाथ कौशिक बताते हैं कि भारतीय राजनीति में जातीय समीकरण कोई नई बात नहीं है. डॉ. राम मनोहर लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद आंदोलन ने पिछड़े वर्ग की राजनीति को नई दिशा दी, जिससे आगे चलकर लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेता उभरे.
उनका कहना है कि बीजेपी भी समय-समय पर सामाजिक प्रतिनिधित्व के जरिए राजनीतिक संदेश देती रही है. हाल ही में बाल कल्याण समिति में बबीता सहोत्रा को जिम्मेदारी दिया जाना भी इसी व्यापक सामाजिक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है. उनके अनुसार अभी से अभियान शुरू करने का उद्देश्य यह भी है कि चुनाव तक यह संदेश लगातार समाज के बीच बना रहे.
हरिद्वार और तराई में सबसे ज्यादा नजर, भीम आर्मी और बसपा भी चुनौती: वरिष्ठ पत्रकार भगीरथ शर्मा का मानना है कि उत्तराखंड में बीजेपी की यह पूरी रणनीति हरिद्वार और तराई क्षेत्र को ध्यान में रखकर बनाई गई है. उनके अनुसार पिछले विधानसभा चुनाव में हरिद्वार जिले में बीजेपी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी.
साल 2022 के चुनाव में जिले की 11 विधानसभा सीटों में से बीजेपी केवल तीन सीटों हरिद्वार, रुड़की और बीएचईएल रानीपुर पर ही जीत दर्ज कर सकी थी. जबकि, बाकी सीटों पर कांग्रेस, बसपा और निर्दलीय उम्मीदवार सफल रहे थे. इनमें अधिकांश क्षेत्रों में दलित मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही. वरिष्ठ पत्रकार भगीरथ शर्मा का कहना है कि,
कई विधानसभा सीटों पर चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में दलित मतदाता: भगीरथ शर्मा के मुताबिक केवल हरिद्वार ही नहीं, बल्कि देहरादून का पछवादून क्षेत्र, डोईवाला, ऋषिकेश, उधम सिंह नगर और नैनीताल जिले की कई विधानसभा सीटों पर भी दलित मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं. यही वजह है कि पार्टी अभी से बूथ स्तर तक सामाजिक संवाद का नेटवर्क तैयार कर रही है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति में एक महत्वपूर्ण पहलू ये भी है कि यहां दलित समाज केवल राष्ट्रीय प्रतीकों से नहीं बल्कि, अपने स्थानीय सामाजिक नायकों से भी गहराई से जुड़ा रहा है. देवभूमि ने जयानंद भारती, हरि प्रसाद टम्टा और खुशी राम आर्य जैसे अनेक दलित नेताओं और समाज सुधारकों को जन्म दिया है, जिनकी सामाजिक स्वीकार्यता आज भी कई क्षेत्रों में बनी हुई है.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या संत रविदास के नाम पर चलने वाला राष्ट्रीय स्तर का समरसता अभियान उत्तराखंड के स्थानीय सामाजिक प्रतीकों पर प्रभाव डाल पाएगा या फिर प्रदेश की राजनीति स्थानीय सामाजिक पहचान के इर्द-गिर्द ही घूमती रहेगी. हालांकि, इतना तय माना जा रहा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता और सामाजिक अभियानों की राजनीति आने वाले महीनों में और तेज होती दिखाई देगी.
उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकता है दलित समाज: बीजेपी जहां समरसता के जरिए सामाजिक विस्तार की कोशिश में जुटी है, वहीं कांग्रेस, बसपा और भीम आर्मी अपने-अपने तरीके से उसी सामाजिक आधार को अपने पक्ष में बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रही हैं. ऐसे में उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में दलित समाज एक बार फिर निर्णायक भूमिका निभाता नजर आ सकता है.

