भालुओं की आबादी और आवास का होगा आकलन, देशव्यापी सर्वे करेगा WII
WII भालुओं की सभी प्रजातियों पर स्टडी करेगा. इससे उत्तराखंड में भालुओं के व्यवहार को समझने में मदद मिलेगी. रिपोर्ट- नवीन उनियाल.
देहरादून (उत्तराखंड): देश में पहली बार वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) भालुओं की चारों प्रजातियों पर राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन करने जा रहा है. इस अध्ययन से देश में भालुओं की संख्या, उनकी प्रजातियों और उनके भौगोलिक वितरण (Geographical Distribution) का पता चलेगा. ऐसे क्षेत्रों को भी चिह्नित किया जाएगा, जहां पहले भालू दिखाई देते थे लेकिन अब उनकी मौजूदगी दर्ज नहीं हो रही है. इससे उनके गायब होने के संभावित कारणों को समझने में मदद मिलेगी. उत्तराखंड के लिए यह अध्ययन खास महत्व रखता है, क्योंकि प्रदेश में भालू और इंसानों के बीच बढ़ता संघर्ष जानलेवा साबित हो रहा है.
देश में भालुओं की चारों प्रजातियों की संख्या और उनके वितरण की जानकारी जुटाने के लिए वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) अध्ययन करने जा रहा है. इस अध्ययन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इससे पहली बार देशभर में भालुओं की चारों प्रजातियों को एक साथ अध्ययन के दायरे में लाने की पहल होगी. इससे न केवल भालुओं की मौजूदगी वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद मिलेगी, बल्कि उन इलाकों का भी पता लगाया जा सकेगा, जहां पहले भालू दिखाई देते थे, लेकिन अब उनकी मौजूदगी दर्ज नहीं हो रही है. उत्तराखंड के लिए यह अध्ययन खास महत्व रखता है, क्योंकि यहां भालू और इंसानों के बीच संघर्ष की घटनाएं लगातार चिंता का विषय बनी हुई हैं.
देश में पाई जाती हैं भालुओं की चार प्रजातियां: भारत में भालुओं की चार प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें हिमालयी भूरा भालू, एशियाई काला भालू, स्लॉथ बियर यानी रीछ और सन बियर शामिल है. इन चारों प्रजातियों का रहन-सहन, प्राकृतिक आवास और भौगोलिक वितरण अलग-अलग है. ऐसे में इनके संरक्षण के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी और संख्या का आकलन करना महत्वपूर्ण है. WII के शोध दस्तावेजों में भी इन चारों प्रजातियों के वितरण और मानव-भालू संघर्ष से जुड़े विषयों का उल्लेख किया गया है. उत्तराखंड में मुख्य रूप से हिमालयी काला भालू, हिमालयी भूरा भालू और स्लॉथ बियर तीन प्रजाती के भालू पाए जाते हैं.
कहां-कहां पाए जाते हैं इन प्रजातियों के भालू:
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भारत में भालुओं की मौजूदगी और उनकी आबादी को समझने के लिए पहले भी कुछ अध्ययन किए गए हैं. हालांकि, उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के आधार पर देश में भालुओं की कुल संख्या और उनकी आबादी में हो रहे बदलावों पर व्यापक तस्वीर अबतक सामने नहीं आ पाई है.
विशेष रूप से स्लॉथ बियर पर हुए अध्ययनों में इसकी मौजूदगी वाले क्षेत्रों, आवास की स्थिति और इंसानों के साथ संघर्ष के कारणों को समझने का प्रयास किया गया है. भारतीय उपमहाद्वीप में स्लॉथ बियर की कुल आबादी के पुराने अनुमानों में लगभग 20 हजार का आंकड़ा सामने आया था.
कहां से गायब हुए भालू, अध्ययन में इस पर भी रहेगा जोर: प्रस्तावित राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन की अहमियत केवल भालुओं की संख्या पता करने तक सीमित नहीं होगी. इसके जरिए यह समझने में भी मदद मिल सकती है कि अलग-अलग प्रजातियां किन क्षेत्रों में मौजूद है और समय के साथ उनके वितरण में क्या बदलाव आया है.
यदि किसी क्षेत्र में पहले भालुओं की मौजूदगी दर्ज की जाती थी, लेकिन अब वहां उनके संकेत नहीं मिल रहे हैं, तो ऐसे क्षेत्रों को चिह्नित करना महत्वपूर्ण होगा. इसके बाद यह समझने का प्रयास किया जा सकेगा कि इसके पीछे जंगलों के आवास में बदलाव, मानवीय गतिविधियों का दबाव, भोजन की उपलब्धता या अन्य पर्यावरणीय कारणों की क्या भूमिका है.
हालांकि, किसी क्षेत्र में भालू दिखाई नहीं देने का अर्थ यह नहीं है कि वहां से उनकी आबादी पूरी तरह समाप्त हो गई है. इसके लिए व्यवस्थित सर्वेक्षण और वैज्ञानिक प्रमाणों की जरूरत होगी. कैमरा ट्रैप, पैरों के निशान, मल और अन्य संकेतों के विश्लेषण जैसी विधियां ऐसे अध्ययन में उपयोगी हो सकती हैं.
उत्तराखंड में इंसान-भालू संघर्ष के समाधान की उम्मीद: उत्तराखंड में भालुओं की मौजूदगी और इंसानों के साथ बढ़ते संघर्ष के कारण इस अध्ययन का महत्व और अधिक है. पर्वतीय क्षेत्रों में भालुओं का आबादी वाले इलाकों के आसपास पहुंचना, लोगों का जंगलों में जाना और प्राकृतिक आवास में बदलाव जैसी परिस्थितियां इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव की आशंका बढ़ा सकती है. राज्य में भालू के हमलों में लोगों की मौत और घायल होने की घटनाएं भी चिंता का विषय रही हैं.
ऐसे में भालुओं की प्रजातियों, उनके वितरण और उनकी मौजूदगी वाले क्षेत्रों की बेहतर जानकारी वन विभाग के लिए उपयोगी साबित हो सकती है. इससे संघर्ष की आशंका वाले क्षेत्रों की पहचान करने, निगरानी की रणनीति तैयार करने और स्थानीय लोगों को समय रहते सतर्क करने में मदद मिल सकती है.
इस तरह का विस्तृत अध्ययन वाला यह पहला प्रोजेक्ट है, जब भालू की चारों प्रजातियों पर राष्ट्रीय स्तर पर इतने बड़े स्तर से अध्ययन हो रहा है. अध्ययन से यह समझने का अवसर भी मिलेगा कि किन क्षेत्रों में भालुओं के प्राकृतिक आवास को बेहतर बनाने की जरूरत है और कहां मानवीय गतिविधियों के कारण उनके साथ टकराव की आशंका बढ़ रही है.
– डॉ. रुचि बडोला, वरिष्ठ वैज्ञानिक, भारतीय वन्यजीव संस्थान –
उत्तराखंड के लिए भालू हमेशा चर्चा का विषय रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में भालू और इंसानों के बीच संघर्ष की घटनाएं काफी तेजी से बढ़ी है. पिछले कुछ समय में भालुओं के व्यवहार में भी बदलाव की बात सामने आई है. यही नहीं, भालुओं के रिहायशी इलाकों में जाने के मामले भी बढ़े हैं.
भालुओं की शीतनिद्रा में आई कमी: यह माना जाता रहा है कि भालू सर्दियों के समय हाइबरनेशन में चला जाता है और इस दौरान वह शीत निद्रा में अपनी सभी गतिविधियां कम कर देता है. लेकिन पिछले कुछ सालों में विशेषज्ञ यह बात कहते रहे हैं कि भालुओं के शीत निद्रा में जाने की कुल अवधि में कमी आई है, जिसके कारण पर्वतीय क्षेत्र में सर्दियों के दौरान भी भालू के इंसानी बस्तियों में पहुंचने और इंसानों पर हमला करने की घटनाएं रिपोर्ट होती रही है.

उत्तराखंड में भालू के इंसानों से संघर्ष की घटनाएं चिंताजनक रही है. ऐसे में भारतीय वन्यजीव संस्थान जो अध्ययन करेगा और उसके बाद जिस तरह की रिपोर्ट सामने आएगी, उसे इस संघर्ष को कम करने में काफी मदद मिलेगी.
– डॉ. प्रदीप मिश्रा, पशु चिकित्सक –
फिलहाल सर्दियां आने से पहले विशेषज्ञ पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को भालुओं को लेकर ज्यादा सतर्क रहने की सलाह देते हैं. ऐसा इसलिए, क्योंकि माना जाता है कि भालू सर्दियों से पहले भोजन की ज्यादा तलाश में रहता है. इसके पीछे का कारण यह होता है कि वह सर्दियां आने से पहले शरीर में भोजन की मात्रा बढ़ाकर एनर्जी एकत्रित कर लेता है, ताकि शीतकाल के दौरान उसे भोजन के लिए ज्यादा मशक्कत ना करनी पड़े.

